Saturday, January 30, 2010

सबको बूराई ही क्यूँ नज़र आती है!!!!!!!!!!!






आज फिर वही २ साल पुराने दिन याद आते हैं, जब बड़ी कंपनी में जॉब थी और इतना व्यस्त हुआ करता था कि घर वालो को छोड़ कर किसी मित्र या जानने वाले का फ़ोन उठाना भी मुस्किल हो जाता था।

तब मेरे दोस्त मुझसे शिकायत करते थे कि यार तू तो बहुत व्यस्त हो गया है दोस्तों के लिए वक़्त नहीं है तेरे पास, बहुत गंभीर हो गया है अभी से ही।

और १ आज का दिन है कि दोस्त ये कहते हैं कि तू सोचता नहीं है अपने भविष्य के बारे में। मुझे थोडा बुरा लगता है क्यूंकि अब मैं भरपूर वक़त दोस्तों को देता हु। जिससे शायद उनको लगता है कि मेरे पास फालतू वक़्त है

लेकिन मेरे समझ में ये नहीं आता है कि यही दोस्त थे जो मुझे पहले कहते थे कि तेरे पास वक़्त नहीं है, और अब जब इनके साथ मैं पूरा वक़्त देता हूँ तो कहते हैं कि तू अब फालतू हो गया है।

यार अच्छाई तो कोई देखता ही नहीं है सबको बूराई ही क्यूँ नज़र आती है।

हम अच्छा करें या बुरा, हमारे आस पास ऐसे लोग जादा होते हैं जो सिर्फ हमें हमारी बुराई ही बताते हैं, क्यूँ कोई हमारा हौसला नहीं बढ़ता है कि आगे बढ़ो अपने लक्ष्य को प्राप्त करो हम सब का सहयोग तुम्हारे साथ है।

जहाँ हमारी खामियां गिनानी होंगी वहां साब लाइन लगा के खड़े हो जाते हैं लेकिन जहाँ हौसला अफजाई और रास्ता दिखने की बात आती है वहां कोई नहीं होता।

Friday, January 29, 2010

दिल तो बच्चा है जी ...

देवेश प्रताप

प्यार एक ऐसा अनोखा बंधन जो उम्र का फासला नहीं जानता है .......प्यार में जब भी दि खोता है तो बच्चे जैसे हो जाता है हाल में इश्किया फिल्म में गुलज़ार साहब ने अपनी अनोखी रचना को पेश किया .......''..दिल तो बच्चा है जी थोडा कच्चा है जी '' बहुत ही सुंदर शब्द दिए है गुलज़ार साब ने .........और बोल दिया है राहत फते अली खान ने ....तथा संगीत से सवारा है विशाल भारद्वाज ने .......सचमुच इस संगीत सुन के बहुत अच्छा लगाबदलते वक़्त के साथ संगीत में भी काफी बदलाव आया है सभी गाने तो दिल तक नहीं उतर सकते है लकिन ये तो दिल में उतर गया..........इस गाने का ऑडियो लिंक हमें प्राप्त नहीं हुआ इसलिए ...ये गाने के शब्द डाल दिया है ....

ऐसे उलझी नज़र उनसे हटती नहीं
दात से रेशमी डोर कटती नहीं
उम्र कब की बरस के सुफेद हो गयी
कारी बदरी जवानी की छटती रही
वल्लाह ये धड़कन बढ़ने लगी है
चहरे की रंगत उड़ने लगी है
डर लगता है तनहा सोने में जी
दिल तो बच्चा है जी - 2 थोडा कच्चा है जी
दिल तो बच्चा है जी
ऐसे उलझी नज़र उनसे हटती नहीं
दात से रेशमी डोर कटती नहीं
उम्र कब की बरस के सुफेद हो गयी
कारी बदरी जवानी की छटती रही
रा रा रा रा ...

किस को पत्ता था पहलू में रखा , दिल ऐसा बाजी भी होगा
हम तोह हमेशा समझते थे कोई हम जैसा हाजी ही होगा
हाय जोर करके कितना शोर करे , बेवजह बातों पे एवे गौर करे
दिल सा कोई कमीना नहीं
कोई तो रोके , कोई टोके
इस उम्र में अब खाओगे धोके
डर लगता है इश्क में करने में जी
दिल तोह बच्चा है जी - (2)
थोडा कच्चा है जी , दिल तोह बच्चा है जी

ऐसी उदासी बैठी है दिल पे , हँसाने से घबरा रहे है
सारी जवानी कतराके कांटी , पीरी में टकरा गए है
दिल धडकता है तोह ऐसे लगता है वोह
आ रहा है यही देखता ही ना हो
प्रेम की मारे कतार रे
तौबा यह लम्हे कटते नहीं है क्यूँ , आँखों से मेरी हटते नहीं क्यूँ
डर लगता है मुझसे कहना नहीं

दिल तो बच्चा है जी - 2 थोडा कच्चा है जी
दिल तो बच्चा है जी





फिल्म - इश्किया
रचना - गुलज़ार
गायक - राहत

Thursday, January 28, 2010

मुझ में ऐसी क्या बात है ???

विकास पाण्डेय

अक्सर लोग कहते हैं अपनी प्रतिभा को पहचानते हुए किसी क्षेत्र में प्रवेश करो, सबसे पहले यह सुनिश्चित कर लें कि इस क्षेत्र में मै अपने क्षमता के अनुसार कार्य कर सकूँगा या नहीं फिर निर्णय लें आदि। अभी कुछ दिन पहले हमारे कॉलेज के सिनेमा के H O D {हेड ऑफ़ डिपार्टमेंट } सर कहने लगे कि ''एक बार मेरे पास एक एक्टिंग सीखने कि चाहत रखने वाला एक लड़का आया, औ कहने लगा कि सर मुझे एक्टर बनना है, मैंने कहा कि लैंग्वेज ठीक करो, डिक्शन पर काम करो और डायलाग डिलेवरी पर पकड़ बनाओ। कुछ समय बाद जब मैंने देखा तो मेरी समझ में आया कि इसकी आवाज़ फटे बॉस कि तरह है और एक्टर बनना तो दूर ये तो ठीक से बोल भी नहीं पता है ,लेकिन कुछ चीज़े अच्छी लगी जैसे कि इसकी इमजीनेसन गज़ब कि है, खुद तो डायलाग ठीक से नहीं बोल पाता लेकिन आपने साथियों को बहुत अच्छी तरह से कहलवा लेता। वहीँ मेरी समझ में आया कि यह लड़का अभिनेता तो नहीं लेकिन अच्छा निर्देशक ज़रूर बन सकता है, फिर मैंने उसे सलाह दी कि तुम डरेक्सन पर ध्यान दो, खैर बात उसकी समझ में आ गयी और आज वह एक बड़ी फिल्म में अस्सिस्टेंट डायरेक्टर कि भूमिका में है'' उस लड़के के समझ में तो बात आ गयी लेकिन क्या हमारे समझ में आती है, और अगर आ भी जाती है तो अमल नहीं करते। ऐसा मेरे साथ जाने अनजाने में अक्सर हो जाता है , ज्यादा दिन पहले कि बात नहीं है आज से लगभग ५ साल पहले जब मै दसवी पास कर लिया था तो मेरे सभी दोस्तों ने साईंस ग्रुप में जाने का निर्णय लिया,मुझे पता था कि मै साइंस के लायक नहीं हु लेकिन हमारे गावों में साइंस का बहुत क्रेज़ है जो लड़का इस विषय से पढ़ता था उसे बहुत ही अच्छे नजरो से देखा जाता था। बस इसी दिखावे में मैंने भी एडमिशन ले लिया। कुछ समय बाद यह लगा की बच्चू अब गाड़ी आगे नहीं चलेगी तो पीछे पलट कर देखा तो अभी फॉर्म भरे जा रहे थे मैंने फ़ौरन ही आर्ट ज्वाइन किया और जान छुड़ाई साइंस से। अभी चार दिन पहले की बात है मेरे किराये के आशियाने में मेरे बचपन के मित्र आये। {वैसे तो वो हम सब के बीच में डॉक्टर के नाम से जाने जाते हैं । यह नाम उनके कागजी नाम से ज्य़ादा जाना जाता है,और यह नाम उनको बहुत रास भी आता है}स्वभावतः हम सब गपशप करने लगे। तभी अचानक उन्होंने एक ऐसा प्रश्न किया कि जिसका जवाब जानने की जिज्ञसा सभी को होती है। उनका प्रश्न कुछ इस प्रकार था की'' यार मैंने सुना है की सभी के अन्दर कोई ना कोई छिपी प्रतिभा होती है, जिसे समझने की ज़रूरत होती है,"मुझ में ऐसी क्या बात है "मै तो हतप्रभ रह गया की इस प्रश्न का क्या उत्तर दू, लेकिन मैंने कोशिश की और कहा तुमको सब डॉक्टर कह कर संबोधित करते हैं और आज तुम सच में डॉक्टर की पढाई कर रहे हो और कुछ दिन के बाद प्रमाण सहित डॉक्टर हो जाओगे। मेरे गाँव में कुछ लोगो के नाम कुछ इस प्रकार हैं डी ऍम,कप्तान,दरोगा,डिप्टी। दोस्तों इस नाम से जुडी एक बहुत दिलचस्प बात याद आ गयी है जिसे मै बिना प्रकट किये रह नहीं पा रहा हू , एक बार कुछ लोग लड़के के लिए रिश्ता लेकर आये,कुछ देर बाद उन लोगो ने कहा की लड़के को बुलाइए,लड़के के चाचा जी वहां खड़े एक छोटे बच्चे से कहा की जाओ जा कर डी ऍम को बुला कर ले आओ,इतना कहते ही लड़की वाले चौक गए की मेरी इतनी हैसियत कहाँ की मै एक डी ऍम से अपनी बेटी की शादी कर सकू। फिर मैंने उस बात को आगे बढ़ाते हुए कहा की तुम तो बहुत किश्मत वाले हो की कहते कहते तुम सच में डॉक्टर हो गए वो लोग तो बस यु ही नाम के ही रह गए . मेरे इतना कहने पर वो मुस्कराते हुए जवाब में सर हिलाए।

आपकी प्रतिक्रियाओ का इंतज़ार रहेगा,
आलोचनाओ का सम्मान रहेगा

मेरी के0 जी0 = पिताजी की इस्नातक





कल अपने बड़े भाई साहब से मिलने गया था। जाना अचानक ही हो गया था क्यूंकि मेरी जेब खली हो चुकी थी, मित्र मंडली में भी कोई ऐसा ना था जो मेरी कडकी को दूर कर पाता क्यूंकि जिनके पास पैसे थे उनके हम पहले से ही कर्जदार थे और जो बाकी बचे थे वो अपने जैसे कडके थे।

सो आखिरी उम्मीद बड़े भैया ही दिख रहे थे। मेरे बड़े भाई मेरे सगे नहीं मेरे बड़े पिता जी के लड़के हैं। उम्र में हमसे ८-९ साल बड़े होंगे लेकिन अपनी जमती खूब है उनसे। खूब चलती पान कि दुकान है उनकी रेलवे स्टेशन पर। उनकी शादी को १० साल हो गए, मेरे भतीजे कि उम्र ४ साल कि है और भतीजी कि १ साल है

बस से उतरा और सीधे दुकान पर चला गया, पहुँचते ही भाई से नमस्कारी कि और थोडा भूमिका बना के कुछ पैसे मागने कि जुगाड़ में लग गया। भाई समझ गए और ५०० के २ नोट मेरी तरफ बढ़ा दिए। पैसे लेने के बाद मैंने गौर किया कि भाई कुछ परेशान हैं आज, मैंने पूछा भाई क्या हुआ कोई बात है क्या जरा परेशान सेदिख रहे हो।

उनोहोने कहा हाँ यार मैं सोचा रहा हूँ कि मेरे पिता जी को तो अंग्रेजी आती नहीं है तो फिर उनोहोने मेरा दाखिला कैसे करवाया होगा स्कूल में। मैंने कहा कि आज कहाँ से ताऊजी कि अंग्रेजी याद आ गई आपको।

भाई ने बताया कि, यार कल स्टेशन पार वाले पब्लिक स्कूल में गया था सोनू के दाखिले कि बात करने तो मैंने कहा कि इसमे इतनी परेशानी वाली बात क्या है अभी तो १-२ महीने का वक़्त है दाखिला करवा देंगे।

भैया कहने लगे कि यार तुझे नहीं पाता ये पब्लिक स्कूल बस नाम से पब्लिक का दिखता है लेकिन है ये अंग्रेजो के लिए, और फिर काउंटर से १ किताब निकते हुए कहा, देख इसमे लिखा है कि अगर किसी बच्चे को के जी में भी दाखिला लेना है तो उसके माता पिता का इंटरविउ होगा, और अगर माता पिता इस्नातक नहीं हैं तो उनका इंटरविउ भी नहीं होगा, यानी कि जिसके माता पिता ने अच्छी शिक्षा नहीं प्राप्त कि हो, उनके बच्चे भी अच्छे स्कूल में नही पढ़ सकते।

मैंने कहा कि भाई तो आपको क्या दिक्कत है आप तो इस्नातक हो, तो भाई ने कहा कि यार तेरी भाभी तो 12th पास है। मैंने कहा भाई ये तो मुस्किल वाली बात है।

भाई बोले कि यार मैं तो जुगाड़ कर लूँगा किसी तरह से लेकिन सोचने वाली बात ये है कि आज हमारी सरकार दुनिया भर के ढोंग कर रही है कि साक्षरता लाओ अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा दिलाओ और जाने क्या क्या लेकिन अगर १ अनपढ़ या कम पढ़ा लिखा आदमी अपने बच्चे का दाखिला अच्छे स्कूल में करवाने जाता है तो पहले उसका बायोडाटा देखा जाता है। इसका मतलब तो यही हुआ कि शिक्षा कि भी केटेगरी है। जिनके माता पिता पढ़े लिखे हैं सिर्फ उनके बच्चे ही अच्छे स्कूल में पढ़ सकते हैं, और जिनके अभिभावक नहीं पढ़े या कम पढ़े हैं उनके बच्चे भी वैसे ही दोयम दर्जे की पढाई करें या फिर अनपढ़ बने रहे।

मैंने कहा भैया गोली मारो यार अपने सोनू का तो दाखिला हो ही जाऐगा ना, दुनिया कि छोड़ो, मैं फिर भाई के पास से निकल गया और बस स्टॉप आ गया, वापस अपने फ्लैट आने के लिए बस का इंतजार करने लगा और मन में ये सोच रहा था कि मैंने जो इस्नातक की पढाई आखरी साल में छोड़ दी थी उसको किसी भी तरह पूरा करना है ताकि कम से कम मेरा बच्चा तो पब्लिक स्कूल में जा सके।

आज भी असमंजस में रहते है........

देवेश प्रताप

जाने क्यों मुझे ले कर घर वाले आज भी असमंजस में रहते है के आगे की ज़िन्दगी में कुछ कर लेगा या नहीं क्यूंकि जो उन्होंने चाहा वो कभी कर नहीं पाया शुरू से मेरे घर वाले कहते थे के मै I.A.S बनू लेकिन मै अपने आपको पहचानता था की मै I AS नहीं बन सकता क्यूंकि पढ़ाई से मै हमेशा दूर भागता था वो व़क्त था जब ज्ञान से वाकिफ नहीं था मै हमेशा याद करने जैसे विषय से दूर रहता था मुझे वो विषय अच्छे लगते थे जिसमें अपना मत देना हो कुछ भी रटा -रटाया हो इलाहाबाद विश्वविद्दालय से स्नातक दुतीय वर्ष छोड़ कर जन संचारिता करने दिल्ली चले आये क्युकी वहा भी वो संतुस्टी नहीं मिल रही थी जो मै चाहता था घर वाले आपनी आशाओ का आशियाना टूटते देखा जो की मुझमें वो अपने सपने देखा करते थे मै ख़ुद सहमा था इस नए सफ़र के लिए क्यूंकि ये आखरी मौका था पने आप को साबित करने का खैर इस नए रास्ते पे चले तो आये लेकिन अपने घरवालो की उम्मीदों के दरवाजे पर ताला लगा कर उनके हर एक सपने को शीशे की तरह चखना चूर कर दिया आज जब भी उनके सामने जाया करता हु उनकी नजरो में आपने आपको केवल एक प्रश्न चिन्ह की तरह पाता हु शायद उनका ये प्रश्न चिन्ह लाज़मी है क्युकी अभी तक किसी भी उम्मीद पर ख़रा नहीं उतरा लेकिन मैंने भी ये तय किया है के उस प्रश्न चिन्ह को गुमान में बदल कर रहंगे शायद इस बात के लिए थोडा सा व़क्त लगे .........ये कुछ पंक्तिया जो मन में लहरों की तरह उठती रहती है


हर
सफ़र में कांटे बिछे होते है
अक्सर वो कांटे पैरों में चुभा करते है

दर्द होता है जब कांटो को हाथो से निकाला करते है
सहन तब नहीं होता जब अपने खड़े होकर निहारा करते है

मुश्किलें आशान नहीं होती रास्ता ख़ुद तय करने से
सीढिया कम नहीं होती मंजिल तक पहुँचने में


Tuesday, January 26, 2010

ए तिरंगे तेरी चमक को......

देवेश प्रताप

गादतन्त्र दिवस पर पे है एक छोटी सी रचना जो पूरी तरह से इस भारत की शान तिरंगों को समर्पित है . इसमें जुड़ी इस विडियो को देखे जो को मोबाइल फ़ोन के कैमरे से तिरंगे के प्यार को दर्शया गया है ।


तिरंगे तेरी चमक को हम सलाम करते है ॥
तेरी रक्षा में अपने खून को तेरे नाम करते है ॥

तुझे झुकने नहीं देंगे ये ऐलान करते है ।
तेरे साये में ख़ुद को बलिदान करते है ॥

तेरे खिलते हुए रंग को देख कर हम भी झूमा करते है
तेरी खुशी के लिए कुर्बान हुए सैनिको को याद करते है ॥

विश्व में लहराता रहे इसी तरह यही हम कल्पना करते है ।
ए तिरंगा तेरी चमक को हम सलाम करते है ॥

Monday, January 25, 2010

अपनी कैटेगिरी तो बता ...........................





काल सुबह मैं करीब ८ बजे उठा और अपना नेट ओन किया की चलो होली में घर जाने की रेलवे टिकेट बुक कर लू, क्यूंकि हमारे घर की तरफ गिनती की २ ही रेलगाड़ियों की सेवा है। रेलवे की ऑनलाइन बुकिंग वेबसाइट खोली और मैंने खली सीट्स चेक की, गिनती की १०-१२ सीट ही खली थी १ ट्रेन में और दूसरी में कोई सीट नहीं थी। इतने में मेरे यहाँ लाइट चली गई, मैंने सोचा की लाइट का कोई भरोसा नहीं है चलो reservation काउंटर से ही टिकेट ले आता हूँ। मेरे घर के सामने हे एम्स हॉस्पिटल है वहां पर reservation काउंटर है। 8:३० तक मैं काउंटर पर पहुच गया, वहम मेरे आगे ३-४ लोग और खड़े थे मैंने फॉर्म लिया और उसको भरा फिर अपनी बारी की प्रतीक्षा में लाइन में खड़ा हो गया।
अब मेरा नंबर आने ही वाला था क्यूंकि मेरे आगे वाले व्यक्ति ने अपना फॉर्म टिकेट बनाने वाले ऑफिस को दे दिया था और वो अपनी जेब से पैसे निकल रहा था टिकेट के।
इतने में टिकेट बनाने वाले ऑफिसर ने अंदर से मेरे आगे खड़े हुए व्यकी से कहा की तुम आदमी हो या औरत, फॉर्म में जगह दी गई है जहाँ साब साफ़ लिखा है की आदमी हो या औरत अंकित करो।
मेरे सामने वाले व्यक्ति ने बड़े ही लहजे से जवाब दिया की सर आपको जो भरना हो भर दो उस जगह पर।
अंदर वाले ऑफिसर ने उसका फॉर्म फेकते हुए कहा की ऐसे कैसे भर दू मैं तुम जाओ इसको भर के लाओ, और चुटकी लेते हुए कहा की क्या तुमको ये भे नहीं पता की तुम आदमी हो या औरत।
मुझे ये सब ड्रामा देख के बहुत गुस्सा आ रहा था क्यूंकि मुझे मालूम था की जितनी देर होगी सीट फुल होने का खतरा उतना ही जादा है, तो मैंने अपने आगे वाले व्यक्ति से कहा की यार तू पुरुष लिख के देदे मुझे भी टिकेट लेनी है देर होगी तो सीट नहीं मीलेगी।
तो उसने कहा की कैसे पुरुष लिख दू , तो मैंने कहा की यार पुरुष नहीं लिख सकता है तो स्त्री लिख दे लेकिन जल्दी कर और भी लोग लाइन में हैं। तो उसने कहा की मैं वो भे नहीं लिख सकता, मेरी कैटेगिरी इस फॉर्म में है ही नहीं। मैं झल्ला गया और मैंने गुस्से में कहा की क्यूँ बे हिजडा है क्या, उसने टपक से जवाब दिया हैं सही समझे हिजड़ा ही हूँ।
उसके बाद वो लाइन से हट गया और मैंने अपनी टिकेट ली, १ आर ऐ सी मिली।
वापस आते हुए रास्ते में मैं सोच रहा था की मुझे उस इंसान को ऐसे हिजड़ा नहीं बोलना था। फिर मेरे मन में ख्याल आया की जब वो इंसान भारत का नागरिक ,है और उसको भारत के संविधान के अनुसार सारे हक़ और मौलिक अधिकार प्राप्त हैं तो उसकी कैटेगिरी क्यूँ नहीं है फॉर्म में।
मैंने घर आया तब तक लाइट आ चुकी थे मैंने नेट ओन किया और रेलवे की साईट खोली और वहां पर दिए गए reservation फॉर्म को भे चेक किया उसमे भी सिर्फ पुरुष और स्त्री कैटेगिरी थी ।
मैंने सोचा की ये क्या ना इंसाफी हो रही है इन किन्नरों के साथ, इनको हमारी सरकार मौलिक अधिकार से ही वंचित रख रही है।
मैंने हिस्टरी में पढ़ा था की पहले राजा की रानियों के सेवक किन्नर हुआ करते थे, और ये युद्ध भी लड़ा करते थे और राजाओ के दरबार में उचे पद पर रहते थे।
लेकिन आज इनकी क्या हालत है की इनको इज्ज़त की जिंदगी जीना भी मुस्किल हो गया है, जब हमारी सरकार ही इनको इस लायक नहीं समजती की इनको इनके संविधानिक हक़ दे, तो क्या होगा इनका?
मैं तो इन लोगो के साथ घटित हो रही गलत चीजो की १ घटना का साक्षी हु, लेकिन रोज हे इन लोगो के साथ जाने क्या क्या घटता होगा ।