Saturday, March 20, 2010
अस्त हो गया हिंदी साहित्य का मार्कन्डे नाम का सूरज
Friday, March 19, 2010
अपने देश कि कला को बढ़ावा दें ......
मैं जिस बात का ज़िक्र आज कर रही हूँ वो न तो किसी विशेष personality से है और न ही किसी व्यक्ति
विशेष से . बस एक ऐसा एहसास जो मुझे अक्सर होता है जब भी मैं किसी के अंदर कोई कला देखती हूँ और उसे अभावों कि ज़िन्दगी जीते हुए देखती हूँ .
मैं ‘Sapna jain’, just on the way to establish myself as a reputated & well known designer. मैं अपने innovation, अपने creation को लोगों तक पहुँचाने कि कोशिश करती हु । कहीं कामयाब होती हूँ तो कही असफल भी । जब कामयाब होती हूँ तो संतुष्टि के साथ एक एहसास होता है कि “हाँ मैं कुछ हु ”. मेरे पास शिक्षा है , एक परिवार है , और मेरे घर वालों का साथ भी , लेकिन दुःख उन्हें देख कर ज़्यादा होता है जिन्हें ये सब नहीं मिला ….उनके पास है तो बस उनकी कला , वो भी बहुत सिमटा हुआ । उनके पास कोई भी ऐसे साधन नहीं है जिससे वो आगे बढ़ सके ।
हमारे शहर (बाराबंकी उ.प्र) से थोडा बाहर कि तरफ में एक परिवार ने सड़क के किनारे पर कुछ सुन्दर मूर्तियाँ लगानी शुरू किया । चूँकि मैं कला कि प्रशंशक हूँ तो मुझे ज्यों ही पाता चला , मैंने वह जा कर देखा कि 1 छोटी सी झोपडी (जो कि ख़ुद उनकी बनायीं हुई थी ) में वो मूर्ति कला का काम करते थे । एक भाई और एक बहन मिल कर . दो छोटे -छोटे बच्चे थे जो कि नंगे मिटटी में घूम रहे थे . पूछने पर पता चला कि वो बहन के बच्चे थे …पति ने शायद छोड़ दिया था ।दोनों भाई बहन मिल कर अपनी कला के ज़रिये अपनी जीविका चला रहे थे ।
मैंने तो अपने स्तर से जितना हो सका किया ..बस चाहती हूँ कि आप भी अपने लेवल से जो बन सकें ज़रूर करें । बहुत बहुत धन्यवाद ।
लेखिका
सपना जैन (Creative Designer)
DREAM CREATION
http://www.newdreamcreation.com/
प्रस्तुतकर्ता
Tuesday, March 16, 2010
ये आंसू ही है......
देवेश प्रतापआँखों में एक अहसास का जन्म होता
पानी की बूंदों जैसा होता है,
छलक आती है ये बूंदे
जब मन रो पड़ता है,
निकल आती है बूंदे ये तब
जब खुशियों का मेला होता है ,
सारे दर्दों को समेट कर
एक बूंद बन जाती है ,
बिखर जाती है ये बूंदे
आँखों से विदा होकर ,
इन बूंदों में अजीब अदा होती है
पत्थरों को भी नरम कर देती है ,
ये आंसू ही है जो ,
इंसान होने का अहसास दिलाती है ॥
Thursday, March 11, 2010
रंग दे बसंती नाम से हुआ शराब का रजिस्ट्रेशन

विकास पाण्डेय
जी हाँ मै भी ठीक इसी तरह हतप्रभ रह गया था ,जिस क्षण मैंने ये ख़बर सुनी।
२३ मार्च 1931 तो आपको निश्चित ही याद होगी,आप सही सोच रहे हैं,इस दिन शहीद भगत सिंह,राज गुरु और सुखदेव को फाँसी दी गयी थी ,इसे हम शहीद दिवस के नाम से भी जानते हैं। करोंड़ो युवाओं के प्रेरणा स्रोत रहे, देश के असली हीरो को उनके 81 वे बलिदान दिवस पर श्रधांजलि देने के लिए पंजाब सरकार के आबकारी विभाग को क्या अनूठा तरीका सूझा है। आने वाले २३ तारीख को पंजाब सरकार ने राज्य में शराब के ठेकों की बोलियों को अंतिमरूप देने का निर्णय लिया है। आम जनता की अकांझाओ और परेशानियों की तो बात ही जाने दीजिये,हम यह भी नहीं चाहते कि इनकी याद में कोई सेमीनार कोई कार्यक्रम हो,लेकिन इस तरह का कार्य बिल्कुल निंदनीय और अशोभनीय है।
हमें पता है कि देश कि सरकार के पास इतना समय नहीं है कि इन शहीदों के लिए कहीं दीप प्रज्वलित करायें और 2 मिनट का मौन रखे ,यहाँ मै नेहरु परिवार कि बात नहीं कर रहा । उस दिन तो बड़े से बड़े नेताओं का तांता लगा रहता है,सब अपना-अपना प्लेटफोर्म बनाने में लगे रहते हैं कि बस एक नज़र मेरे उपर भी पड़ जाए। मै ये नहीं कह रह कि उनकी याद में ऐसा न हो,लेकिन हिन्दुस्तान को आज़ाद करवाने में सिर्फ उन्ही का योगदान नहीं था ,और भी बहुत से स्वतंत्रता सेनानी थे,जिनकी स्मृति में भी दिलचस्पी दिखना चाहिए।
और शहरों का तो नहीं पता लेकिन इलाहाबाद इस मामले में भाग्यशाली है ,जहाँ प्रति वर्ष चन्द्र शेखर आज़ाद की याद में कम्पनी बाग़ में स्थ्ति अल्फ्रेड पार्क में जहाँ आज़ाद जी कि मूर्ति है,वहां कम से कम दीप जला कर उनको श्रधांजलि दी जाती है। लेकिन यहाँ बात २३ मार्च कि कर रहा हूँ तो इस ख़ास दिन इस तरह का कार्य नहीं होना चाहिए ,वो भी सरकार द्वारा। पंजाब सरकार शायद यह भूल गयी कि शहीदों कि बनायी नौजवान भारत सभा का सबसे बड़ा सन्देश यही था कि युवा अपनी कमजोरियों को दूर करें ,नहीं तो खुदगर्ज लोग इसका बहुत ही ग़लत फायदा उठाएंगे।
पंजाब सरकार के इस कृत से साफ स्पष्ट होता है कि इनके मन में शहीदों के लिए कितना स्नेह ,सम्मान ओर इज्ज़त है। किसी ने क्या खूब कहा है कि ---
शहीदों कि चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले ,
वतन पर मर मिटने वालों का यही नामो निशा होगा ।
Friday, March 5, 2010
मोबाइल ........................... जरा संभल के

जितना आधुनिक हम हो रहे हैं उसे रूप में बीमारियाँ और रोग भी आधुनिक हो रहे हैं। शायद ही मोबाइल का दूसरा कोई विकल्प है, लेकिन अगर हम सावधानी बरते तो इससे होने वाले रोगों से बचा सकते हैं।
Wednesday, March 3, 2010
काश यही जनसंख्या होती.....

विकास पाण्डेय
कॉलेज का पेपर चलने के कारण इस बार कि होली में हम [मै और देवेश ] घर नहीं जा पाए। होली के एक दिन पहले जब हम यहाँ के अपने वाले घर को जाने लगे। हम लोग दिल्ली नॉएडा के बोर्डर पर रहते हैं जहाँ से हमारा कॉलेज महज १५ मिनट कि दूरी पर है,यहाँ अपना घर होने पर भी घर से कॉलेज दूर होने के कारण हम घर पर नहीं रह पाते ,जब हम इलाहाबाद में रह कर पढाई करते थे फिर भी हम वहां अपने घर में नहीं रह पाते थे इलाहाबाद के एक कवि हैं शायद उन्होंने ठीक ही कहा था कि
"परिंदे भी नहीं रहते पराये आशियाने में,
हमारी तो उम्र गुज़री है किराये के मकानों में"
आज से लगभग १५ साल पहले जब मै छोटा था और गर्मियों कि छुटियों में जब दिल्ली आया करता था । उस समय दिल्ली की ट्राफिक का बहुत ही बुरा हाल था, न कोई फ्ल्योवर और न ही मेट्रो जैसी अंतर्राष्ट्रीय सुविधा। लेकिन अब ठीक इसी के विपरीत आज इतने फ्ल्योवर , फूटओवर ब्रिज ,सबवे,मेट्रो बनने के बाद भी वही पुराना हाल वही रुला देने वाली ट्राफिक। कॉमनवेल्थ गेम के चलते दिल्ली का सर्वंगीद विकास तो हो रहा है लेकिन ट्राफिक का वही आलम है,जो पहले था।
सारी समस्या की जड़ जनसंख्या ही है, मैंने तो भैया सोच लिया है की "हम दो, हमारे दो'' ,लेकिन कहीं विवाह होने तक चीन की तरह हम दो और हमारे एक का नियम आ जाए तो कोई अचरज नहीं होगा क्यों???
इतना सोचते समझते आत्म मंथन करते जब अचानक समय से पहले घर पहुँच गए तब याद आया की आज तो होली की छूट्टी की वजह से भीड़ भाड़ नहीं थी,और इसी कारण हम जल्दी आ गए ,तब मन से यही आवाज़ आई की काश यही जनसंख्या होती ।
Monday, March 1, 2010
ऐसा विकास किस काम का

कई बार देखने में आया है की जिसको हम रक्षक समझते हैं वही भक्षक निकलता है।
मेरे शहर में जो नारी समाज कल्याण के अध्यक्ष थे उनोहोने ही अपने बेटे की शादी के २ साल बाद अपनी बहु को दहेज़ के लिए के मार दिया ।
हर चीज में हमने आज बहुत तरक्की कर ली है और सामाजिक तौर पर भी हम आज बहुत मजबूत हो गए हैं। लेकिन आज भी जब बात आती है नारी की तो हम सब फिर से गैर जिम्मेदार और १ बिना विकसित दिमाग वाले इन्सानकी तरह सोचने लगते हैं।
अगर लड़की घर से बहार जा रही है तो किस रस्ते से जाऐगी, क्या पहेन के बहार जाऐगी। कई बार यहाँ तक होता है की अपने मोबाइल में किसका नंबर रखन है किसका नहीं ये फैसल भी उसका नहीं होता है। हम विकास कर रहे हैं समाज की भलाई के लिए और उन्नति के लिए लेकिन अगर समाज के १ वर्ग को दबा दिया जाऐगा तो ऐसा विकास किस काम का।
